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भारत चीन का सफर: भाग- 3

घर लौटने के बाद काव्या सीधे दादा जी के कमरे में पहुंची, लेकिन दादा जी कमरे में नहीं थे। काव्या मम्मी के पास पहुंची और जल्दी में दादा जी के बारे में पूछा। मम्मी ने बताया दादा जी पार्क में टहलने गए हैं बस आते ही होंगे।

काव्या दौड़ती हुई बाहर गेट की तरफ भागी। तभी दादा जी सामने से आते हुए दिखे। काव्या उनके पास पहुंची और उनसे जल्दी घर की तरफ चलने के लिए कहने लगी।

दादा जी ने मुस्कुराते हुए कहा- “मुझे पता है तुम इतनी जल्दी में क्यों हो? मन्नू चाचा अभी अभी रास्ते में मिले थे। उन्होंने बताया कि तुम्हें भारत-चीन के बारे में बताने की बारी मेरी है।”

दादाजी और काव्या अब तक घर आ चुके थे।

दादाजी ने कहा- “पहले आओ हाथ-पैर धुल लो, फिर मैं तुम्हें सब बताऊंगा”

काव्या जो काम करने में आना-कानी करती थी। आज उसने झट से कर लिया और आकर बैठ गई। दादाजी भी आए और बैठ गए।

काव्या ने कहा- “मुझे मन्नू चाचा ने बताया कि अंग्रेज जब हमारे देश में थे तो उन लोगों ने चीन से लड़ाई की थी। फिर चीन हमसे क्यों लड़ रहा है और हमारे सोल्जर्स को क्यों मारा?”

दादा जी ने लंबी सांस ली और बोले- “यह सब बहुत उलझा हुआ है, तुम मेरी बात ध्यान से सुनना, तुम्हारे सारे सवालों का जवाब मिल जाएंगे।”

दादा जी ने बोलना शुरू किया- “यह बात 1914 की है तब शिमला में एक मीटिंग हुई, मीटिंग की टेबल पर थे ब्रिटिश भारत और तिब्बत। दोनों देशों के बीच इस दिन आधिकारिक रूप से बॉर्डर तय किया गया। लेकिन दिक्कत यह हुई कि चीन ने उस समझौते को कभी माना ही नही। इस तरह जब तक अंग्रेज थे दोनों देश की सेनाएं अपनी-अपनी क्षमता के मुताबिक जहां तक हो सके इलाके की निगरानी करती थी।

दरअसल चीन ने तिब्बत को कभी आज़ाद देश नहीं माना और चीन में जब 1947 में माओ की अगुवाई में क्रांति हुई तो वहां नई कम्युनिस्ट पार्टी पावर में आई और तिब्बत पर पूरी तरह कब्ज़ा जमाना शुरू कर दिया। यही से अभी जो हम बार्डर पर इतना कॉनफ्लिक्ट देख रहे हैं उसकी शुरूआत भी हो गई।”

काव्या ने बीच में दादाजी को रोकते हुए पूछा- “दादाजी फिर हमारी जीएस बुक में ये क्यों लिखा है कि भारत-चीन का बॉर्डर मैकमोहन लाइन है?  ये मैकमोहन क्या है? कहीं इसकी वजह से तो सारी प्रॉब्लम नहीं शुरू हुई?”

दादा जी बोले- “तुम्हारी किताब में बिल्कुल सही लिखा है। दरअसल 1914 में जो समझौता हुआ उस समय समय ब्रिटिश इंडिया के फॉरेन सेक्रेटरी हैनेरी मैकमोहन थे। उन्होंने ही कागज पर भारत चीन के बीच बॉर्डर बनाया था।”

काव्या ने फिर पूछा, “तो क्या हम लोगों ने चीन को बताया नहीं कि हमारे देश का बॉर्डर कहां है?”

दादा जी बोले- “नहीं! असल में इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी। दरअसल भारत का कहना है कि अंग्रेजों के जाने के बाद उतना इलाका भारत कहलाएगा जो ब्रिटिश राज अपनी सीमा में दिखाता है। इस तरह भारत और चीन ने आपस में कभी एक-दूसरे के साथ नक्शा ही अदला-बदली नहीं किया। इसी का फायदा उठा कर चीन ने कभी भी मैकमोहन लाइन को अपने और भारत का बॉर्डर माना ही नहीं।”

दादा जी ने काव्या से पूछा- “तुम्हें याद है भारत के पहले प्रधानमंत्री कौन है, मैंने तुम्हें हाल ही ने बताया था।”

काव्या ने खुशी से जवाब देते हुए कहा- “हां! उनका नाम जवाहरलाल नेहरू है।”

दादाजी बोले- “बिल्कुल सही! तो वो नेहरू जी ही थे, जिन्होंने 1947 के बाद बॉर्डर को लेकर बढ़ती दिक्कतों को देखते हुए ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया था। वो कैसे भी करके पड़ोसी चीन से रिश्ते सुधारना चाहते थे।

यहां तक कि नेहरू जी ने चीन को उस समय सहारा दिया जब क्रांति के बाद चीन में बनी नई सरकार को दुनिया का कोई भी देश ऑफिशियली रिकगनाइज नहीं कर रहा था।

लेकिन इन सब बातों के बावजूद चीन की जमीन कब्ज़ा करने की नीयत को हम नहीं बदल पाए। आखिरकार 1962 में चीन ने हम पर हमला कर दिया। इस हमले की उम्मीद किसी को नहीं थी। इसके लिए न सरकार तैयार थी ना सेना।”

काव्या ने दादा जी से चौकतें हुए पूछा- “क्या यह वहीं 1962 का भारत-चीन युद्ध है को मेरी हिस्ट्री वाली बुक में है।”

दादा जी ने कहा- “हां यह वही 1962 का युद्ध है जिसमें हमारे हजारों सैनिक मारे गए, जमींन का एक हिस्सा भी हम गंवा बैठे और भारत-चीन की बॉर्डर मैकमोहन लाइन कहीं पीछे छूट गई। तुम्हारे कमरे में टंगे मैप में लद्दाख के ईस्ट पार्ट में जहां अक्साई चिन लिखा है वह पूरा भाग चीन के कब्ज़े में चला गया। जब युद्ध शांत हुआ तो भारत-चीन के बीच नया बॉर्डर कहलाया LAC यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल।”

काव्या ने दादाजी को बीच में रोककर पूछा- “ये लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल क्या होता है दादाजी?”

दादाजी बोले- “यह उस बॉर्डर को कहते है जहां युद्ध खत्म होने तक दो  देश की सेनाओं का कब्ज़ा होता है।”

फिर काव्या ने पूछा- “तो अब इतनी टेंशन क्यों है?”

दादाजी बोले- “असल में 1962 के युद्ध के बाद भी दोनों देशों ने आपस में नक्शा अदला-बदली नहीं किया। अब चीन ठहरा ज़मीन हथियाने वाला। फिर क्या था, चीन ने 1962 की लड़ाई के बाद भी लद्दाख से लेकर हमारे नार्थ-ईस्ट के राज्य सिक्किम, अरुणाचल तक में बहुत सारे जमीन को अपना बताता रहा। लेकिन इस बीच शुक्र यह रहा कि कभी भी युद्ध जैसी नौबत नहीं आई। इस बीच दोनों देश की सीमा पर तैनात सैनिकों के बीच भी एक अनकही सी अंडरस्टैंडिंग बन गई थी कि कौन कितने इलाके में निगरानी करेगा।”

लेकिन पिछले दो महीने से जो हो रहा है उसमें चीन अनकहे समझौते और तय की गई लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल दोनों को तोड़ रहा है।

कहा जा रहा है कि अप्रैल से ही चीनी सैनिक ईस्ट लद्दाख के गलवान घाटी,  पैंगांग त्सो लेक, देपसांग और सिक्किम, अरुणाचल में भी भारत के निगरानी वाले हिस्से में घुस आए हैं। जब भारत ने इसका विरोध किया तब चीनी सैनिक मारपीट पर उतारू हो जा रहे हैं। यहां तक कि चीन के साथ चल रहे इस हाथापाई में हमारे 20 सैनिक तक शहीद हो गए”।

काव्या और दादा जी कुछ देर तक शांत रहे…

फिर काव्या ने एकदम से पूछा, “दादाजी! सैनिकों के पास तो बंदूक होती है, फिर जब मारपीट होती है तो अपनी जान बचाने के लिए हमारे सोल्जर्स गन क्यों नहीं चलाते?”

दादा जी बोले-  “असल में नब्बे के दशक में हमारे देश और चीन के बीच कुछ समझौते हुए हैं। इसमें तय किया गया है कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के पास बंदूक और ऐसे दूसरे हथियार दोनों ही देश के सैनिक नहीं चलाएंगे।”

इतना कुछ जानने के बाद काव्या उदास हो गई थी और उसे थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था। दादाजी काव्या के चेहरे का हावभाव देखकर समझ गए थे कि काव्या को भी सैनिकों के शहादत और बॉर्डर पर चल रही घटनाओं को जान लेने के बाद बुरा लगा है।

इतने में काव्या बोल पड़ी- “अब मैं समझ गई दादाजी क्यों भईया कल से चीन के सारे एप फोन से अनइंस्टॉल करने के लिए कह रहा है। लेकिन दादाजी मुझे एक बात समझ नहीं आ रही कि बॉर्डर की लड़ाई के बदले हम लोग चीन के एप अनइंस्टॉल क्यों कर रहे हैं, इससे क्या होगा?”

दादाजी ने काव्या से कहा, “ये तुम्हें फिर भईया ही अच्छे से बता पाएगा।”

काव्या दादाजी के पास से उठ कर अपने कमरे में चली गई और अब वह भईया के आने का इंतजार करने लगी।

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