पिताजी का कमरा  

पिताजी का कमरा  

पिताजी का कमरा है उस तरफ वहीं जहाँ दूसरा दरवाजा है आना जाना उठना बैठना अखबार बिछा चावल चुनना चाय पीते पीते किसी दोस्त का आ जाना वहीं ठहाका लगाना अपना जीवन अंदर नहीं लाते थे अंदर जहाँ और कमरे थे और लोग और एक कमरा जहाँ एक और जीवन जिया था जब चाय उस […]

छत

छत

पहले जब गांव जाते थे- शाम सबेरे छत पर‌ तमाम किस्से होते थे। उनमें से कुछ सच्चे कुछ झूठे भी होते थे। छत पर ही खाना गाना होता था। वहीं नाना,नानी,मामा मामी और हम बच्चे ख़ूब उधम मचाते थे। टांट भी बहुत खाते थे। अब तो छतों के रूप रंग बदल ‌गये है छतों के […]

गाय की व्यथा

गाय की व्यथा

हमने गाय को अलग अलग नजरिये से देखा पर उसने हमें सिर्फ एक ही नजरिये से देखा, ‘घृणा’ के नजरिये से वो चाहे, हिंदू हो सिख हो ईसाई हो मुसलमान हो सबने की है ज्यादती उसके, उसके बच्चे और उसकी देह के साथ। हमने जबरन उसके इच्छा के विरूद्ध दूध निकाला, माँस नोंचा और उसके […]

पिता का कर्ज़ चुकाना होगा

आपके ही हाथों को पकड़कर मैं चलना सीखा था। आपकी मीठी मुस्कान के पीछे छुपा आपका दर्द बड़ा तीखा था।   आपके नक्श-ए-कदम पर चलकर  मुझे दुनिया को दिखाना होगा कि होनहार औलाद अभी भी ज़िंदा है मुझे मेरे पिता का कर्ज़ चुकाना होगा।