barish ke din
बारिश के दिन

बहुत समझने के बाद मुझे सदियों बाद मालूम हुआ जैसे ही कोई मेरी ज़िंदगी में आता है मैं उन्हें अपनी दुनिया मानने लगता हूँ , मेरी दुनिया उसमें आने वाले लोगों में ही रही है इसलिए शायद जैसे ही लोगों के जाने का आभास होता है वह टूटने लगती है परत दर परत इसलिए नहीं कि मैंने उसे चीज़ों से बुना है बस इसलिए कि वह महीन प्रेम और भावना के हमेशा इर्दगिर्द ही रही है ! मेरा अस्तित्व मेरी दुनिया के लोगों पर टिका है | तुम कह सकती हो कि यह निहायत कमज़ोरी है कि तुम दुनिया के चंद लोगों से अपनी दुनिया रच लो और ठहर जाओ! यह आसान है ?

कायरता भी,पर मैं  जानता हूँ इतनी बड़ी दुनिया के बीच इतने सारे लोगों की भीड़ के बीच तुम हो इसलिए नहीं कि तुम्हारा अस्तित्व है वह बेहद बौनी चीज़ है ,तुम स्वयं को दुनिया में कितना बड़ा बना लो कितने मशहूर हो जाओ पर अगर तुम्हारी लाश पर एक आदमी भी सच्चे आँसू न रो सके, तो तुम्हारा होना रत्ती भर भी कामयाब नहीं , तुम्हारी  शोहरत कतई इस बात से तय नहीं होगी कि तुम कितनी अमीरी में जिए वह  तुम्हारी दुनिया में तय होगी कि तुम मरे तो कितने आँसुओं ने तुम्हारी कब्र को भिगोया ! 

तुम हमेशा ऐसे ही दुनिया को गढ़ खुद को बर्बाद कर सकते हो ?

बर्बादी का सबब बनने के लिए वे रास्ते काफ़ी हैं जिनसे गुजरते हुए तुम गई थीं !

मैं नहीं पूछना चाहता कि तुम क्यों चली गई ,मैं जानता हूँ तुम्हारे पास ठहरने की कोई ठीक -ठीक वजह नहीं थी ! इच्छा का अपना कोई मन नहीं होता तुम जब चाहे उसे किनारे लगा सकती हो किसी और इच्छा में  बदल सकती हो खुद को  भी  ,  पर मैं ,मैं कभी इच्छाओं से नहीं गढ़ा ,तुम कह सकती हो कि मेरी दुनिया इस नाटक की चारदिवारी  तक कभी नहीं गई ,माया नहीं है मुझे ! सिर्फ एक कोने भर का मन है जिसे भीड़ में तलाशता फिरता हूँ ,

तुम गईं तो रोका नहीं मैंने तुम्हें कि किसी को कभी रोकना नहीं आया मुझे ! 

मैं खुद  तो कब और कितना ही रुका था अपनी ज़िंदगी में जो तुम्हें रोकता ?

ये दुनिया अलग है ,इसमें पेंट से रंगने को रंग तो है पर भीतर से इसके पर्दों पर गहरा कालापन चस्पां है मैं उन्हें  चाह कर भी किसी साबुन से धो नहीं सकता !

फिर हमारे नाटक का क्या ? उसका निर्देशन तो तुम ही कर रहे थे ? 

नहीं तुम गलत थीं मैं कभी निर्देशक नहीं बन सका न मैंने बनना चाहा ही कभी ,वे स्थिर जीव हैं मैं हमेशा एक   अदाकार की भूमिका में ही रहा हूँ मेरे सपने हमेशा छोटे रहे, किसी की गुलामी से इतर पर जब मैं आप पीछे लौटता हूँ तो देखता हूँ क्या एक अदाकार के रूप में भी मैं गुलाम नहीं रहा ? उन सब शब्दों का जो मेरी दुनिया ने मेरे लिए गढ़े थे या फिर उन सब क़िताबों का  जिनका एक -एक शब्द मेरी रूह में उतरते हुए मुझे भेदता है भीतर तक ,टूटने की कोई काट नहीं होती !जानती हो न ?

“हाँ जानती हूं शीशा जब टूटता है तो दूर तक छिटक जाता है कहीं और उसकी किरिच सदियों तक आने -जाने वालों के कदमों से खून की धारा निकालती रहती है! तुम्हारे कमरे में वह कांच आज भी है ! उठाया क्यों नहीं ?

मैं अँधेरे दिनों में एक मोमबत्ती की तलाश में था बहुत दिनों तक पर वह मुझे किसी बाज़ार में न मिली ,मैं शहर के दूसरे किनारों तक गया पर रात के अँधेरों तक आते -आते मुझे आभास हो गया यह मुझे यूँ ही काटनी है दूर तक बिखरी चाँद की संदली रौशनी के बीच ,फिर एक दिन मैं इस कमरे में लौटा तो धीमी रौशनी झर रही थी ,मैंने पास जाकर उसका पता चाहा तो देखा वह टूटी हुई खिड़की से छन के मेरे पास आ रही थी ,उसपर लगे पीले पर्दे से वह न जाने कितने रंग बिखरा रही थी ,तब से मैंने दिन को अपना साथी चुन लिया !

“साथी यह नाम तुमने मुझे दिया था न ? 

हाँ  फिर एक रोज़ मैं एक अजीब शहर से निकला तक मुझे मालूम हुआ एक नाम कितने की लोगों का हो सकता है ! मैं एक बच्चे से मिला उसका नाम शम्भू था उसकी हँसीं में दुनिया घुली हुई मिली फिर कुछ दिन बाद मैं एक किनारे के शहर में गया जहां एक कामगर मजदूर का नाम मैंने पूछा जानती हो उसने क्या नाम दोहराया ? शम्भू , अभी कुछ रोज़ पहले मैं पुरानी दिल्ली के चावड़ी बाज़ार से गया वहां मुझे एक बूढ़े आदमी मिले जानती हो उनका नाम क्या था ?

शम्भू ! 

तब मैंने जाना कि नाम का कोई खासमतलब नहीं है आदमी के अस्तिव में तुम नाम से  प्रेम करते हो तो तुम कितने ही आदमियों से प्रेम कर सकते हो ,और अगर तुम आदमी से प्रेम करती हो तो उसका नाम तुम्हारी देह में तब  तक गूँजता रहेगा जब तक तुम हो और दुनिया से लौट नहीं जाते !

तो क्या तुम याद रखोगे हमेशा ?

मैं भूला ही कब था और मैंने तुम्हें कब कहा कि मैं भूल गया ? मैं याद है पहली दफ़ा जब मैंने तुम्हारा नाम दुहराया तो तुमने पूछा था क्या तुम मेरे नाम वाली किसी ओर लड़की को भी जानते हो ? और मैंने मुस्कराते हुए कहा था नहीं सिर्फ़ तुम्हें ! आज भी सिर्फ तुम्हें ही जानता हूँ फर्क सिर्फ़ इतना है कि अब तुम्हारे आँखों पर मस्कारे से तुम्हारी आँखों का रंग बदल गया है ,तुम्हारे घुंघराले बाल अब सीधे और चमकदार जान पड़ते हैं 

“और तुम्हारी दाढ़ी निकल आई है !” जानते हो जब मैं यहां आई तो अजीब सा संशय था मुझे तुम यहाँ रहते होंगे  या नहीं ? क्या तुम होंगे भी या नहीं पागलों का कोई भरोसा नहीं वे ज़िन्दगी से कब मुँह मोड़ लें, फिर तुम्हें तो उसकी चाहना भी कभी नहीं रही ! मैं भीतर ही भीतर कितने दिन डरती रही फिर एक दिन एक जगह तुम्हारा लिखा  पढ़ा तो मेरी उम्मीद जगी ये उम्मीद भी कितनी अजीब चीज़ है एक बार मन की तरह कहीं लग जाए तो सदियों तक पीछा ही नहीं छोड़ती !”

हाँ जैसे तुम  नहीं छोड़ती मुझे उम्मीद थी तुम एक दिन जरूर लौटोगी , बस यह नहीं जानता था कि यहाँ इतने साल बाद यहीं लौट आओगी वह भी इन बारिशों के दिनों में जो तुम्हें शायद मुझे भी ज़्यादा अज़ीज रहे हैं !

पूर्णिमा वत्स

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