ठीक छह साल का था आदि जब उसने अपने नन्हें क़दमों से चलना सीखा था।मम्मा ने पापा की ओर मुस्कुराकर कहा, फिर आदि की ओर देखा और बोलीं, “अब तो तुम इतनी तेज़ी से भागते हो कि पकड़ में ही नहीं आते!” आदि मम्मी को समझ रहा था उसे खुद पर कुछ गर्व हुआ, “पकड़ोगे कैसे मम्मा मैं अपनी स्कूल रेस का चैम्पियन जो हूँ |” बच्चे कब और कैसे बड़े हो जाते हैं, यह बात उन्हें कभी मालूम नहीं होती ।हाँ एक-आध बार शीशे के आगे खड़े होकर वे अपना कद ज़रूर माप लेते हैं ।लेकिन कद बढ़ना अलग बात है और बड़े होना अलग ।मम्मा आजकल यही सब बातें करती हैं ।आदि को बड़ों की बातों में यूँ तो कोई खास दिलचस्पी है नहीं लेकिन वह बड़े होने के मायने अब कुछ-कुछ समझने लगा है ।एक समय तक जब वह स्कूल नहीं जाता था और पहली बार जब वह स्कूल गया की स्मृति कुछ-कुछ उसके दिमाग़ में है ।कल उसने रेस जीती तो आते ही वह मम्मा से चिपट गया ।फिर औचक ही जाने कहाँ से उसने ये सवाल पूछ लिया, “मम्मा मैं रेस में क्यों इतना खुश रहता हूँ ? कहाँ से सीखा मैंने ? आज सर पूछ रहे थे तो मेरे पास कोई खास जवाब नहीं था इस बात का|” मम्मा आदि की बात समझ रही थीं।उन्होंने आदि को बताया कि जब वह बहुत छोटा था, तभी से वह बहुत तेज़ भागता था ।किसी की पकड़ में नहीं आता था ।इसलिए मम्मा पहले ही समझ गई थी कि एक दिन ये लड़का रेस में जीतकर आएगा ! मम्मा ने कुछ हँसते हुए कहा ।आदि सब समझ रहा था ।उसने फिर पूछा, “फिर फॉर्मल ट्रेनिंग क्यों नहीं दिलवाई ? हर रोज़ कभी सड़क पर, कभी खेत में क्यों दौड़ाते रहे?”
मम्मा ने समझाया कि कम साधनों में जीवन चलाना यूँ ही आसान बात नहीं है ।मम्मा ने पापा की ओर देखकर कहा ।वे जानती थीं आदि यह सब समझने के लिए अभी बहुत छोटा है ।लेकिन आदि सब कुछ समझ रहा था और जज्ब कर रहा था ।कल वह स्कूल गया तो उसने हाफ़ मैराथन के बारे में एक पोस्टर में पढ़ा ।पोस्टर ठीक स्कूल के गेट के सामने चौबे जी की दुकान के ख़म्बे पर लगा था ।वहाँ खड़े पन्द्रह-बीस लड़के मैराथन में जाने का प्रोग्राम बना चुके थे ।उसमें आदि सबसे छोटा था।आदि को पोस्टर पढ़ता देख एक
लड़का उसके पास आया और बोला, “क्यों बे चूज़े ! तू क्या पढ़ रहा है ये बच्चों के पढ़ने की चीज़ नहीं है, माना कि तू स्कूल का सबसे तेज़ भागने वाला धावक है लेकिन है तो चूजा !” यह बात कह वह ठहाके मारकर हँसने लगा और उसके साथ खड़े बड़े कद के लड़के भी तेज़ ठहाका मारने लगे।
आदि के पास कद और उम्र न सही पर आत्मसम्मान कूट- कूट कर भरा हुआ था ।उसने मन में ठान लिया था कि हो न हो वह यह रेस जीतकर ही रहेगा ।धावक आख़िर धावक है ! उसने हर दिन क्लास के बाद कोच को कह प्रैक्टिस बढ़ा दी ।पहले तो कोच ने बड़ी ना नुकुर की जैसा की सरकारी स्कूल के कोच अक्सर करते हैं लेकिन बाद में वे मान गए ।अब प्रैक्टिस रोज़ छह घंटे होती ।स्कूल से बाहर आकर वह पोस्टर पर नज़र डालता और तैयारी में जुट जाता ।देखते -देखते मैराथन के दिन पास आने लगे थे ।इसके साथ ही आदि की स्पीड भी बढ़ी थी लेकिन उतनी नहीं बढ़ पाई थी कि वह किसी से कम्पीट कर सके ।बड़े सपनों को लंबा समय चाहिए होता है वे एकदम से न तो पकते हैं और न बड़े ही होते हैं ।कुछ ही दिनों में आदि ने क्लास लेना छोड़ दिया था ।वह अक्सर गाँव के खेत में जाकर दौड़ने लगा था ।दिन-रात एक करने के बाद आखिरकार वह दिन आ ही गया जिसका आदि को इंतज़ार था ।लेकिन इसमें भी बड़ी समस्या थी ।उसने किसी को नहीं बताया था कि वह मैराथन में भाग लेगा और यह भी कि दौड़ने की तैयारी तो उसने कर ली है लेकिन कागज़ और फॉर्म भरना उसे नहीं आता ।
ठीक एक रात पहले आदि मम्मा के पास गया और उन्हें सब बातें साफ़-साफ़ बता दीं, कैसे लोगों ने मज़ाक बनाया, उसने क्लास बंक की और कैसे वह कल जाना चाहता है ।बच्चों के सपने दुनिया में कोई समझे न समझे लेकिन माँ समझती थीं ।रात को तय किया गया कि वे दोनों सुबह की बस से निकल जायेंगे ।सुबह की बस में बैठकर दोनों निकल भी गए ।माँ बस के बाहर देख रही थीं और आदि उनकी गोद में सो गया था।जगह पर पहुँचते-पहुँचते लंबा समय बीत गया।वे ठीक समय से पहले ही मैराथन में पहुँच गए थे।इतनी भीड़ आदि ने पहले कभी नहीं देखी थी ।मैराथन के बारे में भी उसे कुछ खास पता नहीं था ।मम्मी ने फॉर्म भर दिया था और उसे सब रूल समझा दिए गए थे ।मम्मी आदि को छोड़कर कहीं दूर लोगों की भीड़ में गुम हो गई थीं ।पहली गोली की आवाज़ आई यह तैयारी की संकेतक थी ।आदि ने कमर कस ली थी ।भागते हुए उसे बस पिद्दी वाली बातें याद आ रही थी ।धीरे-धीरे आसपास के सब लोग ग़ायब होने लगे थे ।अब आदि सिर्फ़ अपने कदमों की आवाज़ सुन पा रहा था ।उसने और तेज़ी से भागना शुरू किया देखते ही देखते उसे एक लाल फीता दिखाई दिया ।आसपास लोग दिखाई दिए ।”क्या वह प्रथम आया है ?”
उसने इधर-उधर सिर घुमाकर देखा ।नहीं दो धावक उससे पहले थे ।उसे कुछ हताशा हुई ।आदि से ठीक पहले दो धावक समय पर रेखा पार कर चुके थे ।दोनों आदि के पास आये और उसे कंधे पर उठा लिया ।बाहर घोषणा हुई कि आदि तीसरे स्थान पर है और वह आज तक का सबसे कम उम्र का धावक है ।इसलिए उसकी ट्रेनिंग का ख़र्च अब मैराथन वाले उठाएंगे ।यह सुनकर आदि को बड़ी ख़ुशी हुई, उसकी मेहनत सफ़ल जो हुई थी।कुछ ही समय में आदि को एक मैडल पहनाया गया ।स्टेडियम में गाना गूँज रहा था, “ये हौसलों की उड़ान है !”

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