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ओजोन परत (Ozone Layer) नहीं होगी तो जल जाएगी धरती?

धरती और सूरज के बीच अगर ओजोन परत नहीं होगी तो क्या पूरी पृथ्वी जल जाएगी? ओजोन के बारे में किताब में पढ़ते हुए अभिषेक ने अचानक अपने पापा से यह सवाल पूछ लिया था। पापा कहीं बाहर जाने के लिए तैयार हो रहे थे और उन्हें देर भी हो रही थी लेकिन अब जब सवाल पूछ लिया गया है तो जवाब देना ही था। लेकिन पापा को भी क्या मालूम कि ओजोन-वोजोन नहीं होगा तो धरती पर क्या होगा? वह विश्वविद्यालय जाते तो हैं लेकिन प्रोफेसर तो नहीं हैं। अब विज्ञान विभाग में क्लर्क हैं तो क्या यह ज़रूरी है कि ओजोन के बारे में उन्हें पता ही रहे?

अभिषेक के पिता इलाहाबाद विश्वविद्यालय में विज्ञान विभाग के क्लर्क हैं। विज्ञान के बड़े नामी-गिरामी प्रोफेसर्स के साथ उनका मिलना-जुलना तो है लेकिन यह भी सच है कि उनके 5वीं में पढ़ने वाले बेटे के विज्ञान के एक छोटे से सवाल का जवाब उनके पास नहीं है। उन्होंने अभिषेक को किसी काम का बहाना बताकर जैसे-तैसे टाल तो दिया लेकिन सवाल उनके मन में भी धंस गया था। उन्होंने तय किया अगले दिन वह जरूर प्रोफेसर डॉ. नरेश उत्तम से यह सवाल करेंगे कि यह ओजोन-वोजोन का मामला है क्या?

भौतिक विज्ञान की क्लास ख़त्म होने के बाद नरेश उत्तम अपने ऑफिस में जैसे ही घुसे, उन्होंने देखा कि श्याम सुंदर जी वहां पहले से बैठे हुए हैं। पहले तो उत्तम साहब, उन्हें देखकर चौंक गए लेकिन फिर मुस्कुराते हुए उन्होंने उनका स्वागत किया। जैकेट उतारकर कुर्सी पर रखते हुए उन्होंने पूछा, “कहिए, श्यामसुंदर जी! इधर कैसे आना हुआ?”

श्याम सुंदर जी बोले, “कोई खास बात नहीं डॉ. साहब, बस ऐसे ही सोचा काफी दिन हो गए हाल-चाल नहीं लिया। सो चले आए।”

“हालचाल सब बढ़िया आप बताइए। कुछ काम तो होगा जरूर.. नहीं तो आप कहां अपना मठ छोड़ने वाले हैं।” प्रोफेसर साहब ने चुहल करते हुए सवाल दागा।

श्याम सुंदर ने ज़्यादा समय न गंवाने का सोचते हुए थोड़ा संकुचित अंदाज़ में कहा, “डॉ, साहब! एक सवाल है, जो मेरे बेटे ने मुझसे पूछा है और मुझे उसकी जानकारी आपसे चाहिए। अगर आप बताएंगे तो मैं उसे जाकर बता पाऊंगा, नहीं तो बेटे की नज़र में अपनी इज्ज़त तो गई।” बात खतम करते-करते श्याम सुंदर जी “हा-हा” करके हंस दिए।

श्याम सुंदर की बात सुनकर डॉ. उत्तम भी मुस्कुराने लगे। उन्होंने कहा, “पूछिए तो श्याम सुंदर जी! ऐसा कौन-सा सवाल है जिसका उत्तर आप नहीं जानते?”

“विज्ञान का है डॉक्टर साहब, ये ओजोन क्या होता है?” श्याम सुंदर जी ने पूछा।

सवाल सुनकर गहरी सांस लेते हुए डॉ.उत्तम बोले- “श्याम सुंदर जी! ओजोन एक रासायनिक गैस है। ऑक्सीजन के छोटे-छोटे अणुओं से मिलकर बनती है।”

प्रोफेसर का जवाब सुनकर श्याम सुंदर बोले, “मेरे बच्चे ने पूछा है, डॉ. साहब! कि क्या ओजोन नहीं होगा तो धरती सूरज की रोशनी से जल जाएगी?”

“ओजोन नहीं श्याम सुंदर जी, ओजोन परत।” प्रोफेसर ने सवाल करेक्ट किया।

श्याम सुंदर “हां-हां” कहते हुए जिज्ञासु भाव से उनकी ओर देखने लगे।

डॉ. साहब बोले, “श्याम सुंदर जी, धरती जलेगी तो नहीं लेकिन जब आपने ज़िक्र छेड़ा है तो ओजोन के बारे में आपको सब कुछ बता ही देता हूं। ऐसा है कि धरती पर ज़िंदगी के लिए बड़ी जटिल और रहस्यमयी व्यवस्थाएं हैं। इनके बारे में विज्ञान समय-समय पर पता लगाता रहता है। पृथ्वी के वायुमंडल में कई तरह की गैसें होती हैं, ये तो आप जानते ही हैं। इन्हीं में ऑक्सीजन भी होता है, जो हम सांस के जरिए ग्रहण करते हैं। इसी ऑक्सीजन के जब तीन अणु मिलते हैं तो ओजोन गैस बन जाती है।”

प्रोफेसर साहब आगे बोले, “श्याम सुंदर जी, ओजोन बहुत ज़हरीली होती है और इसका रंग नीला होता है लेकिन हमारे वायुमंडल में यह बहुत कम मात्रा में पाई जाती है। मान लीजिए कि अगर वायुमंडल में अलग-अलग गैसों के 10 हज़ार अणु हों तो उनमें से सिर्फ तीन अणु ओजोन गैसे के होंगे। अगर ऐसा न होता तो हम सांस नहीं ले पाते। लिहाजा, धरती पर इंसानों का जीवन ही मुश्किल में पड़ जाता। इसलिए ये गैसें काफी मात्रा में धरती से 20 किलोमीटर ऊपर पाई जाती हैं।”

श्याम सुंदर जी के लिए यह जानकारी एकदम नई थी। उन्होंने पूछा कि, “20 किमी कितना दूर है। अगर ओजोन वहां से नीचे आ जाए तो? क्या हम सब उसके ज़हर से खत्म हो जाएंगे?”

डॉ. साहब बोले, “नहीं। गैस नीचे आएगी ही नहीं। हमारा जो वायुमंडल है, वह गैसों की चादर से घिरा हुआ है। ऐसा मान लीजिए जैसे धरती ने गैसों का एक कंबल ओढ़ा हुआ है। ऐसे कंबल के ऊपर कंबल जैसी वायुमंडल की 5 परतें हैं। ओजोन नीचे से दूसरे नंबर की परत में तो होता है लेकिन उसके धरती पर आने की संभावना नहीं होती।”

इन परतों में जो सबसे निचली परत है उसे क्षोभमंडल यानी कि ट्रोपोस्फीयर कहते हैं। बारिश, आंधी, ओले जैसी मौसम वाली घटनाएं इसी मंडल में होती हैं। भूमध्य रेखा से धरती के ऊपर आसमान की ओर 18 किमी तक ट्रोपोस्फीयर होता है। इसके बाद समताप मंडल यानी कि स्ट्राटोस्फीयर शुरू हो जाता है। इसी परत में ओजोन गैस मिलती है। सिर्फ मिलती ही नहीं बल्कि यह परत के रूप में धरती को घेरे रहती है। धरती से तकरीबन 20 से लेकर 35 किमी की ऊंचाई तक ओजोन परत फैली है लेकिन जहरीली गैसों का यह समूह हमारे लिए हानिकारक होने की बजाय बहुत सहयोगी और फायदेमंद होता है।

श्याम सुंदर बोले, “ज़हरीली भी है और हानिकारक भी नहीं। यह क्या रहस्य है?”

प्रोफेसर साहब बोले, “श्याम सुंदर, इसे जानने के लिए तुमको सूरज की रोशनी के बारे में जानना होगा। सूरज की रोशनी जो हमें सीधी-सीधी पीले रंग की दिखाई देती है, वह उतना एकरूप है नहीं। जैसे किसी शायर ने कहा है न कि ‘हर आदमी में हैं दस-बीस आदमी, जिसे भी देखिए कई बार देखिए।’ वैसे ही सूरज की रोशनी में भी कई तरह की किरणें होती हैं। जैसे, रेडियो किरणें, पराबैगनी किरणें, गामा किरणें, एक्स रे आदि। इनमें से ज़्यादातर हमें दिखाई नहीं देतीं और हमारी सेहत के लिए घातक भी होती हैं। सूरज से निकलने वाली पराबैगनी यानी कि अल्ट्रावॉयलेट किरणें तो कैंसर, स्किन बर्न, हीटस्ट्रोक और मोतियाबिंद जैसी बीमारियां पैदा करने वाली होती हैं। ऐसे में धरती के लोगों को इन किरणों से बचाने के लिए सूरज और हमारे वायुमंडल के बीच एक फिल्टर लगा दिया गया है, जो पराबैगनी किरणों को 35 किमी ऊपर ही रोक देता है और धरती उसके खतरनाक असर से बच जाती है।”

“श्याम सुंदर जी, आपको पता है वह फिल्टर क्या है? यही ओजोन परत जो हानिकारक गैसों का भंडार है। अपने यहां कहते हैं न कि “ज़हर को ज़हर काटता है”, तो पराबैगनी और ओजोन मिलकर एक-दूसरे को काट देते हैं और हमारे जीवन का एक शत्रु हम तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाता है।”

श्याम सुंदर इतनी सारी नई जानकारियों के बीच अजनबियों की तरह चेहरे बनाए उनसे परिचित हो रहे थे। तभी उन्हें ध्यान आया कि सबसे ज़रुरी सवाल तो रह ही गया, जिसके बारे में उन्हें अपने बेटे को जवाब देना है।

श्याम सुंदर प्रोफेसर से बोले, “लेकिन डॉक्टर साहब! मेरे बेटे ने यह क्यों पूछा कि ओजोन परत नहीं होगी तो क्या धरती जल जाएगी?”

तब प्रोफेसर साहबी बोले – “वो इसलिए क्योंकि साल 1985 में पहली बार दक्षिणी ध्रुव (एंटार्कटिका) यानी कि धरती के निचले हिस्से की ओर ओजोन की परत में छेद होने का पता चला था। इसके बाद से पर्यावरण वैज्ञानिकों में हड़कंप मच गया क्योंकि ओजोन परत में छेद का मतलब है कि सूरज की पराबैगनी किरणें सीधे धरती पर आनी शुरू हो जाएंगी। इससे न सिर्फ धरती पर गर्मी बढ़ेगी बल्कि इसके खतरनाक प्रभावों से इंसानों और अन्य प्राणियों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा।”

प्रोफेसर आगे बोले, “तुम्हारे बेटे को लगा होगा कि पराबैगनी किरणें धरती पर आएंगी तो धरती जल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं होगा। ओजोन मंडल में सूरज की किरणों को फिल्टर करने वाले इस परत का बनना-बिगड़ना लगातार चलता रहता है। आखिर यह छेद तो हम इंसानों का ही बनाया हुआ है।”

श्याम सुंदर चौंक गए। इंसानों ने अपने नुकसान का यह उपाय क्यों किया होगा? उन्होंने डॉक्टर साहब से पूछा कि “इंसानों ने ओजोन के छेद क्यों और कैसे बढ़ाए”

डॉक्टर साहब बोले, “श्याम सुंदर, तुम्हारे घर में फ्रिज है?”

उन्होंने “हां” में जवाब दिया तो प्रोफेसर बोले, “तब तो तुम भी ओजोन का छेद बढ़ा रहे हो।”

प्रोफेसर आगे बोले, “चौंको नहीं, हम सभी लोग, जो फ्रिज, एसी, कूलर आदि का इस्तेमाल करते हैं, उससे ही तो ओजोन में छेद बढ़ रहा है। ऐसे जो भी यंत्र हैं, जिनको ठंडक लाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जैसे, फ्रिज और एसी ही ले लो, जब इनका हम इस्तेमाल करते हैं तो इनसे एक गैस बाहर निकलती है। इस गैस को वैज्ञानिक क्लोरो-फ्लोरो कार्बन कहते हैं। यह क्लोरो-फ्लोरो कार्बन जब ओजोन मंडल में जाती है तो उसके साथ रिऐक्शन यानी कि अभिक्रिया करती है। इससे ओजोन परत का क्षरण होता है। यह क्षरण ही ओजोन परत में छेद बढ़ाता है।”

थोड़ा-सा घबराए श्याम सुंदर जी बोले, “तो क्या हम लोगों को फ्रिज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए?”

प्रोफेसर बोले, “क्यों नहीं लेकिन बहुत नियंत्रित तरीके से इनका इस्तेमाल करना चाहिए। बहुत ज़्यादा जरूरत हो तभी ताकि ये यंत्र कम से कम गैसें छोड़ें।”

“एसी की जब जरूरत हो तभी इस्तेमाल करें। फ्रिज अनावश्यक न चलाएं। इसके अलावा पॉलिथिन इत्यादि में हम जो कचरा फेंकते हैं, वह भी सूरज की रोशनी से अभिक्रिया करती हैं और क्लोरो-फ्लोरो कार्बन बनाती हैं। ऐसे में पॉलिथीन का इस्तेमाल कम करके भी हम अपनी तरफ से इस विपत्ति को आने से पहले रोकने में योगदान दे सकते हैं। वैसे हम ऐसे छोटे-छोटे प्रयास ही कर सकते हैं। बड़े स्तर पर कई देशों की बड़ी-बड़ी संस्थाएं क्लोरो-फ्लोरो कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए दिन-रात काम कर रही हैं। इसके बावजूद अपने पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखने किए हम जितना कुछ कर सकें, हमें करना ही चाहिए।”

इतने में प्रोफेसर साहब की अगली क्लास का वक्त हो गया और वह उठकर जाने लगे। श्याम सुंदर जी भी उनके साथ बाहर चले आए। उनके चेहरे पर अद्भुत चमक, संतोष और खुशी के भाव थे। उन्हें काफी जानकारी हासिल हो चुकी थी, जो वह अपने बेटे को बता सकते थे।

 


राघवेंद्र

मूलतः अपने आपको पाठक और अध्येता बनाने की कोशिश के बीच थोड़ा-बहुत लिखने की इच्छा ने पत्रकार बनने को प्रेरित किया। साइंस में ग्रैजुएशन करने के बाद जर्नलिज्म में दाखिला ले लिया। पत्रकारिता जारी है और अपने निजी विचारों-भावों की अभिव्यक्ति के लिए ब्लॉग-लेखन भी चलता रहता है। आत्मतोष के लिए कविता लेखन का भी कार्यक्रम होता रहता है। साथ ही जीवन भर पढ़ने-लिखने के जुगाड़ में लगे रहने की कोशिश रहती है।

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