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सरस्वती पूजा और मां

दरवाज़े पर सरस्वती पूजा का चंदा मांगने वाले लोग चंदे के लिए आवाज़ लगा रहे थे। “दीदी, पूजा के लिए चंदा दे दीजिए।” कमरे में बैठी रूपा इस आवाज़ से तिलमिला उठी, क्योंकि मां को खोए अभी एक साल भी नहीं बीता था, लेकिन ऐसा लगता था जैसे कितनी सदियों का सफर तय हो चुका है।        

मां को सरस्वती पूजा का प्रसाद बहुत प्रिय था और आखिरी बार वह सरस्वती पूजा पर ही मां के साथ बाहर गई थी। उसके बाद तो वक्त ही पलट गया। मां हमेशा के लिए छोड़कर चली गई। 

बाहर से आती आवाज़ अब तेज़ होती जा रही थी, मगर रूपा का मन बाहर जाने का बिल्कुल नहीं कर रहा था। यकायक उसके मन में मां की कही बातें कौंध गई। “अगर खुद दुखी रहो, तब भी लोगों को खुश रखने की कोशिश करनी चाहिए। भले ही स्वयं कोई खुशी ना मना सको, मगर जिन्हें मन है, उनका मन कड़वा नहीं करना चाहिए।” 

मां की सीख याद आते ही रूपा 101 रुपए लेकर चंदा देने पहुंच गई। बाहर मोहल्ले के बच्चों को देखकर उसने कहा, “यह लो सरस्वती पूजा के लिए चंदा।” “दीदी, हम यहां भले ही चंदा मांगने के बहाने से आए थे, मगर सच बात तो यह है कि हम सब आपसे मिलना चाहते थे। आंटी सरस्वती पूजा में बहुत खुशी से भाग लेती थीं, मगर उनके जाने के बाद आप कितनी चिड़चिड़ी हो गईं हैं। पिछली बार की पूजा में आंटी ने ही सबकुछ बनाया था और आप भी तो आंटी के साथ आई थीं। हम बस आपको देखने आए थे कि आप ठीक हैं या नहीं। हमें आपसे चंदा नहीं चाहिए, बल्कि हम चाहते हैं कि आप भी आंटी की तरह हमारे साथ पूजा में सम्मिलित हो। इससे हमें भी आंटी की कमी महसूस नहीं होगी और आपका मन भी बहल जाएगा।” 

बच्चों की बातें सुनकर रूपा का दिल पसीज गया। जिन आंखों में चिड़चिड़ापन और गुस्सा समाया हुआ था, वह अब ख़त्म हो चुका था। रूपा ने कहा, “जरूर, मैं पूजा में जरूर आऊंगी।” इतना कहकर वह अपने कमरे में वापस आ गई और बच्चों की टोली आगे बढ़ गई। 

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